Kabir Bijak Ramaini 4 | कबीर बीजक रमैंनी 4 | Pdf Download

Are you looking for the interpretation of Kabir Bijak Ramaini 4 in Hindi, if yes then you have come to the right place.In this post, Sadhguru Kabir Saheb’s Bijak Ramani has been presented with a complete explanation and example. Which is the ultimate test of knowledge.The vast ocean of Amritvani of Kabir Sahib is “Bijak”. The first episode in Bijak is Ramaini. The explanation of kabir Saheb bijak ramaini is Following –

सद्गुरु कबीर साहेब विरचित
व्याख्याकार
सद्गुरु अभिलाष साहेब

*” बीजक “* सदग्रंथ
प्रथम प्रकरण : रमैनी

Kabir Bijak Ramaini 4

परखकर जाल से बचने वाला ही निर्मल होता है

प्रथम चरण गुरु कीन्ह विचार।
कर्ता गावैं सिरजनहारा।। १ ।।
कर्महिं कै कै जग बौराया।
सक्ति भक्ति कै बांधिनि माया।। २।।
अदबुद रूप जाति की बानी।
उपजी प्रीति रमैनी ठानी।। ३।।
गुणी अनगुणि अर्थ नहिं आया।
बहुतक जने चिन्हि नहिं पाया।। ४ ।।
जो चीन्हैं ताको निर्मल अंगा।
अनचिन्हें नर भये पतंगा।।५।।

Kabir Bijak Ramaini 4 की साखी
चिन्हि चिन्हि का गावहु बौरे, बानी परी न चिन्ह।
आदि अन्त उत्पति परलय, आपुही कहि दीन्ह।।४।।

 

Kabir Bijak Ramaini 4 के शब्दार्थ

प्रथम चरण = वेद रचने के पूर्व। गुरु = ऋषिगण या ब्रह्मा। कर्ता = ईश्वर। कर्महि = कर्मकांड, यज्ञादि। सक्ति = शक्तिसम्पन्न जीव। अदबुद = अदभुत।जाति = सिद्धांत, संप्रदाय। रमैनी = प्रार्थना। आपुहि = मनुष्य स्वतः।

Kabir Bijak Ramaini 4 का भावार्थ

ऋषियों तथा ब्रह्मादि गुरुओं ने वेद रचना के प्राथमारंभ में संसार पर विचार किया और वे जगत-रचयिता-कर्ता का गुणगान करने लगे ।। १ ।।

गुरुओं ने जीवों को कर्मकांड के जाल में फंसाकर उन्हें उन्मत्त कर दिया और भक्ति की माया में शक्तिमान जीव को बांध दिया ।।२।।

इन सम्प्रदायों की वाणियां अदभुत रूप हैं। इन्हें सुनकर मनुष्यों के मन में विरह उत्पन्न हुआ और वे उस कल्पित धारणा के लिए प्रार्थना करने लगे ।।३।।

चाहे कोई गुणी हो चाहे अनगुणी, चाहे कोई विद्वान हो चाहे अविद्वान,उक्त कथित ‘ सिरजनहार ‘ के गीत का अर्थ नहीं समझ सके। अधिकतम लोग इस मन के भुलावे को नहीं समझ सके।।४।।

जिन्होंने इस माया को पहचान लिया, उनका मन निर्मल हो गया, और जो बे-पारखी रहे, वे माया-मोह की आग में पतिंगे के समान जलकर नष्ट हो गये।। ५ ।।

हे पगले ! परखो ! परखो ! बिना परख किये वाणी को क्या गाते हो ? तुम वाणीजाल की परख नहीं कर सके। जगत के आदि-अंत तथा उत्पत्ति-प्रलय की बातें तो तुमने अपने आप ही कल्पना कर-करके कह डाली है ।।४।।

Leave a Comment