Kabir Bijak Ramaini 5 | कबीर बीजक रमैनी 5 | Download

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सद्गुरु कबीर साहेब विरचित
व्याख्याकार
सद्गुरु अभिलाष साहेब

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बीजक  सदग्रंथ
प्रथम प्रकरण : रमैनी

Kabir Bijak Ramaini 5

रमैनी-5

कहलौं कहौं युगन की बाता।
भूले ब्रह्म न चीन्हैं बाटा।।१।।
हरि हर ब्रह्मा के मन भाई।
बिबि अक्षर लै युक्ति बनाई।।२।।
बिबि अक्षर का कीन्ह बँधाना।
अनहद शब्द ज्योति परमाना।।३।।
अक्षर पढ़ि गुनि राह चलाई।
सनक सनन्दन के मन भाई।।४।।
वेद कितेब कीन्ह विस्तारा।
फैल गैल मन अगम अपारा।।५।।
चहुँ युग भक्तन बाँधल बाटी।
समुझि न परलि मोटरी फाटी।।६।।
भय भय पृथ्वी दहुँ दिश धावै।
अस्थिर होय न औषध पावै।।७।।
होय बिहिस्त जो चित न डोलावै।
खसमहि छाड़ि दोजख को धावै।।८।।
पूरब दिशा हंस गति होई।
है समीप सन्धि बुझै कोई।।९।।
भक्ता भक्तिक कीन्ह सिंगारा। बूड़ि गयल सब माँझल धारा।।१०।।

Kabir Bijak Ramaini 5 की साखी

बिनु गुरु ज्ञान दुन्द भई,
खसम कही मिलि बात।
युग युग सो कहवैया,
काहू न मानी बात।।5।।

Kabir Bijak Ramaini 5 के शब्दार्थ-

बाटा = रास्ता। भाई = अच्छी लगी। बिबि अक्षर = दो अक्षर—ओ + म् + हं । बँधाना = विधान, नियम, परिपाटी। अनहद शब्द = अनाहतनाद, खोपड़ी में उठती हुई नसों की झनकार। ज्योति = मस्तिष्क की गरमी, आंखों की गरमी।परमाना = सत्य। गैल = गया। बाटी = बाट, भक्ति मार्ग। मोटरी फाटी = भ्रम की गठरी फट पड़ी। औषध = पारख, बोध। बिहिस्त = स्वर्ग, मोक्ष। खसमहि = पति, स्वस्वरूप। दोजख = नरक, विषय-वासना। पूरब दिशा = ज्ञान-दिशा, ज्ञान, परखबुद्धि। हंसगति = विवेक की दशा, स्वरूपस्थिति।

प्रसंग :- हंसदशा भ्रांतियों से परे है

Kabir Bijak Ramaini 5 का भावार्थ

Kabir Bijak Ramaini 5

युगों की बातें कहां तक कहूं, संसार के लोग ब्रह्म के स्वरूप को भूल गये, सही रास्ता नहीं परख सके। अर्थात ब्रह्म की वास्तविकता क्या है, यह नहीं समझ सके ।। १ ।।

 

विष्णु, महादेव तथा ब्रह्मा के मन में भी यही बात अच्छी लगी और वे ओ+सो+ हम् आदि दो अक्षर मिलाकर ब्रह्म की व्याख्या करने तथा संसार-सागर से तरने का उपाय बताये ।।२।।


Kabir Bijak Ramaini 5

 

इस प्रकार ब्रह्म को व्याख्यायित करने के लिए दो अक्षरों की परिपाटी बनायी, और अनाहतनाद-श्रवण तथा ज्योति-दर्शन को ब्रह्म का प्रामाणिक साक्षात्कार मान लिया।।३।।

शास्त्रों को पढ़-गुनकर सम्प्रदाय चलाये गये और सनक-संन्दनादि को भी ये मार्ग अच्छे लगे।।४।।


 

वेदों और किताबों का बहुत विस्तार हुआ। इन अगम-अपार वाणियों एवं शब्दजाल में मनुष्यों का मन बिखरकर उलझ गया।। ५ ।।

भक्तों ने चारों युगों में भक्ति-मार्ग की योजनाएं बनायी हैं। उनकी समझ में यह बात नहीं आयी कि हमारे ऊपर भ्रम की मोटरी फट पड़ी है।।६।।


Kabir Bijak Ramaini 5 ki vyakhya in Hindi

संसार के मनुष्य भयभीत होकर दसों दिशाओं में भटकते हैं। न वे स्थिर होते हैं और न उन्हें बोध एवं शांति-रूपी औषध मिलती है।। ७।।

यदि मनुष्य अपने मन को चंचल न करे, तो उसको तत्काल स्वर्ग का सुख प्राप्त हो। परन्तु मन तो अपने चेतनदेव प्रभु को छोड़कर विषय-वासना रूपी नरक में दौड़ता है।। ८।।


Kabir Bijak Ramaini 5 ki Explaination

हंस की स्थिति ज्ञानपरक दशा में है। यह तत्त्व सबके पास है, परन्तु इसका रहस्य कोई बिरला समझता है।।९।।

भक्त लोग भक्ति श्रृंगार करते हैं और सब संसार-सागर में डूबकर मरते हैं।।१०।।

Kabir Bijak Ramaini 5 की साखी का भावार्थ

बिना गुरुज्ञान के ही यह झगड़ा मचा है। भक्तजन लोगों से मिलकर जीव के ऊपर किसी भिन्न खसम की बात बताते हैं। इस प्रकार के उपदेश युगानयुग से चले आ रहे हैं और उन्हीं के प्रभाव में लोग प्रभावित हैं। सही बात मानने वाला कोई नहीं ।।५।।

 

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