Kabir Saheb Bijak Ramaini 1 in Hindi Free pdf Download

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Kabir Bijak Ramaini 1

Kabir Saheb Bijak Ramaini 1 in hindi

अंतर ज्योति शब्द एक नारी।
हरि ब्रह्मा ताके त्रिपुरारी। ||1||

ते तिरिये भग लिंग अनन्ता।
तेउ न जानै आदिउ अन्ता। ||2||

बाखरि एक बिधाते कीन्हा।
चौदह ठहर पाट सो लीन्हा। ||3||

हरिहर ब्रह्मा महन्तो नाऊँ।
तिन्ह पुनि तीन बसावल गाऊँ। ||4||

तिन्ह पुनि रचल खण्ड ब्रह्मण्डा।
छौ दर्शन छानबे पाखण्डा। ||5||

पेट न काहू वेद पढ़ाया।
सुन्नति कराय तुरुक नहिं आया। ||6||

नारी मोचित गर्भ प्रसूती।
स्वांग धरे बहुतै करतूती। ||7||

तहिया हम तुम एकै लोहू ।
एकै प्राण बियापै मोहू। ||8||

एकै जनी जना संसारा ।
कौन ज्ञान से भयउ निनारा। ||9||

भौ बालक भगद्वारे आया ।
भग भोगी के पुरुष कहाया । ||10||

अविगति की गति काहु न जानी।
एक जीव कित कहूँ बखानी। ||11||

जो मुख होय जीभ दश लाखा ।
तो कोइ आय महन्तो भाखा । ||12||

साखी – कहहिं कबीर पुकारि के, ई ले ऊ ब्यौहार । रामनाम जानै बिना , भौ बूड़ि मुआ संसार। ||

Kabir Saheb Bijak Ramaini 1 OR Kabir Bijak Ramaini 1 के शब्दार्थ —

अन्तर = भीतर। ज्योति = ज्ञान- ज्योति, चेतन । शब्द-वाक- शक्ति । नारी = कल्पना, माया । त्रिपुरारी = तीन पुर के शत्रुः तारकासुर के तीन पुत्र – तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली के पुरों को नष्ट करने वाले महादेव ।

बाखरि=बखारी, कोठी, संग्रहालय । पाट= विस्तार, फैलाव । महन्तो = महान । सुन्नति= खतना । नारी मोचित = नारी के पेट से खिंचकर । गर्भ प्रसूती गर्भस्थ बच्चा पैदा होता है। स्वांग = वेष, दिखावा ।

करतूती=कर्मकांड। तहिया=गर्भ में। जनी=स्त्री, माया जना उत्पन्न किया हुआ; उत्पत्ति भौ=भव, उत्पन्न अविगति = अज्ञात । ई = इहलोक, मोटी माया, खानी- जाल । ऊ = परलोक, झीनी माया, वाणी- जाल। राम = हृदय-निवासी चेतन तत्त्व ।

Kabir Saheb Bijak Ramaini 1 OR Kabir Bijak Ramaini 1का भावार्थ-

सभी देहधारियों के भीतर एक ज्ञान ज्योति है, जिसे जीव, चेतन या आत्मा कहते हैं। मानव विवेकशील प्राणी है। उसके पास शब्द – शक्ति तथा कल्पना – शक्ति की विशेषता है। मानव अपनी अंतर्ज्योति एवं ज्ञान – शक्ति से कल्पना का विस्तार करता है तथा अपनी मनःकल्पना को शब्दों में व्यक्त करता है।

Kabir Saheb Bijak Ramaini 1 की चौपाई 1 का अर्थ : – मानव की मनःकल्पना और शब्द-योजना रूपी नारी या माया से ब्रह्मा, विष्णु तथा महादेव की उत्पत्ति (स्थापना) हुई।’ अर्थात सृष्टि को समझने के लिए ब्रह्मा, विष्णु तथा महादेव की कल्पना की गयी ॥ 1 ॥

Kabir Saheb Bijak Ramaini 1 की चौपाई 2 का अर्थ : – इन तीनों ने बहुत-से पुत्री -पुत्र पैदा किये, परन्तु ये भी सृष्टि का आदि और अंत नहीं जान सके ॥ 2 ॥

Kabir Saheb Bijak Ramaini 1 की चौपाई 3 का अर्थ : – ब्रह्मा रजोगुणी होने से क्रियाशील थे, इसलिए उन्होंने तात्कालिक वाणियों का एक बड़ा संग्रह तैयार किया, जिसका पीछे से चौदह विद्याओं के रूप में विस्तार हुआ ॥ 3 ॥
Kabir Saheb Bijak Ramaini 1 की चौपाई 4 का अर्थ : – विष्णु, महादेव तथा ब्रह्मा महान प्रसिद्ध नाम वाले हुए । इन्होंने क्रमशः तीन गांव बसाये जिन्हें विष्णुपुर, शिवपुर तथा ब्रह्मपुर कह सकते हैं, अथवा इन्होंने क्रमशः भक्ति, ज्ञान और कर्मकांड चलाये ॥ 4 ॥

Kabir Saheb Bijak Ramaini 1 की चौपाई 5 का अर्थ : – फिर इन्होंने ब्रह्मांड को खंडों में बांटा। अर्थात पृथ्वी पर विभागपूर्वक राज्य स्थापित किये। अथवा वाणी का विविध विषयों में विभाजन किया। फिर छह दर्शन और छानबे पाखंडों का विस्तार हुआ ॥ 5 ॥

Kabir Saheb Bijak Ramaini 1 की चौपाई 6 का अर्थ : – माता के पेट से कोई न तो वेद पढ़कर आता है जो अपने आप को जन्मजात ब्राह्मण कह सके तथा न कोई सुन्नत कराकर आता है कि वह अपने आप को जन्मजात मुसलमान कह सके ॥ 6 ॥

Kabir Saheb Bijak Ramaini 1 की चौपाई 7 का अर्थ : – माता के पेट से पैदा होने के बाद ही लोग नाना स्वांग तथा कर्मकांड करते हैं ॥ 7 ॥

Kabir Saheb Bijak Ramaini 1 की चौपाई 8 का अर्थ : – माता के पेट में तो हम और तुम एक ही प्रकार रज- वीर्य से बने हैं, एक ही प्रकार सब में प्राण व्याप्त हुए हैं तथा एक ही प्रकार सब वहां मूढ़ता में पड़े रहे हैं ॥ 8 ॥

Kabir Saheb Bijak Ramaini 1 की चौपाई 9 का अर्थ : – एक ही प्रकार माता से संसार के सभी लोग जन्म लेते हैं, फिर किस ज्ञान से भिन्न वर्ण और जाति की कल्पना कर ली जाती है ! ॥ 9 ॥
Kabir Saheb Bijak Ramaini 1 की चौपाई 10 का अर्थ : – एक ही द्वार से बालक रूप में सब पैदा होते हैं, जिससे पैदा होते हैं उसी में आसक्त होकर पुरुष कहलाते हैं ॥ 10 ॥

Kabir Saheb Bijak Ramaini 1 की चौपाई 11 का अर्थ : – अज्ञात की दशा का किसी को पता नहीं है। कितना विवरण देकर कहूं कि एक मनुष्य जीव ही श्रेष्ठ है’ ॥ 11 ॥

Kabir Saheb Bijak Ramaini 1 की चौपाई 12 का अर्थ : – यदि किसी के मुख में दस लाख जीभ हों, तो ऐसा महान पुरुष भले आकर अज्ञात की बातें कह सके ॥ 12 ॥

     सद्गुरु कबीर पुकारकर कह रहे हैं कि मनुष्य लोक-परलोक, खानी वाणी एवं मोटी-झीनी माया के व्यवहार को लेकर उसमें उलझ गया है। राम ऐसा नाम किसका है, रामतत्त्व क्या है, इसे जाने बिना संसार के लोग भ्रांति सागर में डूब रहे हैं ॥

Explaination of Kabir Saheb Bijak Ramaini OR Kabir Bijak Ramaini :-

पहले यह समझ लेना है कि ‘बीजक’ का अर्थ क्या है ! सद्गुरु कबीर की इस महान रचना का नाम ‘बीजक’ है। उन्होंने स्वयं इसका नामकरण करने के साथ अर्थ भी बता दिया है। अतएव ‘बीजक’ का अर्थ जानने के लिए ‘बीजक’ से बाहर नहीं जाना है। सद्गुरु ने 37वीं Kabir Saheb Bijak Ramaini की साखी में कहा है—

बीजक बित्त बतावै, जो बित गुप्ता होय ।
ऐसे शब्द बतावै जीव को, बूझै बिरला कोय ॥

अर्थात बीजक उस धन को बताता है जो कहीं गुप्त रूप से गड़ा हो। इसी प्रकार बीजक के शब्द जीव के वास्तविक स्वरूप को बताते हैं, परन्तु इसे कोई बिरला समझता है।

पहले समय में बैंक तो होते नहीं थे। उस समय लोग अपने धन को चांदी, सोना, रत्नादि के रूप में करके और धातु के पात्र में रखकर किसी गुप्त स्थान में गाड़ देते थे और उसे समझने के लिए ताम्र आदि किसी धातु पत्र पर सांकेतिक शब्दों (कोडवर्ड) में लिख देते थे, जिसे उनके परिवार तथा अनुगामी लोग ही पढ़कर समझ पाते थे।  उसे ही ‘बीजक’ कहा जाता था। इसलिए बीजक के शब्द गूढ़ एवं रहस्यात्मक कहे जाते थे । सांकेतिक शब्दों में धन का परिचय देने वाला वह ताम्रपत्र ही ‘बीजक’ कहलाता था।

जैसे वह बीजक गड़े हुए गुप्त धन को बताता था, वैसे सद्गुरु कबीर का ‘बीजक’ ग्रंथ इस शरीर में छिपे हुए जीव-तत्त्व का बोध कराता है और जगत के गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन करता है। इसलिए इसका नाम ‘बीजक’ है।

इस ग्रंथ में जगह-जगह गूढ़ प्रयोग भी हैं, इसलिए भी इसका ‘बीजक’ नाम सार्थक है। साखी प्रकरण की 27वीं साखी में सद्गुरु कहते हैं-

पाँच तत्त्व के भीतरे, गुप्त बस्तु अस्थान ।
बिरला मर्म कोइ पाइहैं, गुरु के शब्द प्रमान ॥

बीजक ग्रंथ के अंत में किसी बीजक – मर्मी संत ने पाठफल के रूप में नौ साखियां बनाकर अलग से रख दी हैं, जो प्राचीन काल से चली आ रही हैं।

उनमें कहा गया है—“बीजक का अर्थ है धन का पता एवं संदेश देने वाला । जिस जगह आत्मा रूपी धन है, कबीर साहेब के बीजक – वचनों के द्वारा वहीं का उपदेश है। अतएव जो अपने हाथों में बीजक लेकर उसे पढ़ेगा, वह आत्म- धन को शोध लेगा।

              इसलिए इस ग्रन्थ का नाम बीजक है, क्योंकि इसमें आत्मा तथा माया – मन का ज्ञान होता है। आत्मा राम (जीव) सत्य है और मायाकृत मन-मानंदी असत है।

बीजक के गुरुमुख वचनों से इसकी यथार्थ परख करना चाहिए। इस ग्रंथ का नाम बीजक है। इसमें सारशब्द ( निर्णय वचन) हैं तथा यह टकसार (प्रामाणिक) है।

गुरु कृपा से बीजक द्वारा सत्यासत्य की परख होती है। यहां कबीर साहेब की वाणी पूर्ण होती है।”

Example of Kabir Saheb Bijak Ramaini OR Kabir Saheb Bijak Ramaini :-

बीजक कहिये साख धन, धन का कहै संदेश।
आतम धन जेहि ठौर है, बचन कबीर उपदेश ॥
देखै बीजक हाथ लै, पावै धन तेहि शोध ।
याते बीजक नाम भौ, माया मन को बोध ॥
अस्ति आत्मा राम है, मन माया कृत नास्ति ।
ज्याकी पारख लहै यथा, बीजक गुरुमुख आस्ति ॥ सार शब्द टकसार है, बीजक याको नाम ।
गुरु की दया से परख भई, बचन कबीर तमाम ॥

आज भी व्यापारी लोग जब किसी सामान की बिक्री करते हैं, उसका बिल बनाते हैं, जिसे ‘बीजक’ कहा जाता है। अतः सम्पत्ति की सूचना बीजक में ही होती है।

           बीजक छिपे हुए धन को बताने वाला सार, सत्य एवं गूढ़ वचन है, इसका स्पष्टीकरण करते हुए मानसमर्मज्ञ श्री जयरामदास दीन जी गीताप्रेस से प्रकाशित ‘मानस – शंका-समाधान’ में लिखते हैं- ” श्री रामचरित मानस ग्रंथ में श्री ग्रन्थकार के शब्द कहीं-कहीं ‘बीजक’ के तौर पर भी पाए जाते हैं, जिनकी खोज मम जनों को प्राप्त होने से ही यथार्थ तत्त्व का ज्ञान होता है, जिससे अत्यन्त सुख की प्राप्ति होती है।” (पृष्ठ 94 )

सद्गुरु कबीर – रचित ‘बीजक’ कोई किस्सा-कहानी की पुस्तक एवं प्रबंध- काव्य नहीं है, जिसमें नाना प्रकार के विषय रस का वर्णन होता है। ‘बीजक’ का राम वैसा संकुचित नहीं है जिसके हाथ, छाती, आंख, मुख आदि के लिए कमलों तथा कामदेव की उपमा देकर उसका शृंगारिक वर्णन किया जा सके।

कबीरदेव का बीजक सार्वजनिक, सार्वभौमिक स्वरूप राम का परिचायक है तथा उसके ऊपर लगे हुए भ्रमजालों को छिलके की तरह उखाड़ फेंकने वाला है, जो सार निर्णयों और गूढ़ प्रयोगों से भरा है। इसका भेद कोई मर्मी पारखी पुरुष ही देते हैं।

         इसका अर्थ यह भी नहीं समझना चाहिए कि पूरा बीजक ग्रन्थ गूढ़ प्रयोगों से ही भरा है। पारिवारिक, सामाजिक, नैतिक, चारित्रिक, राष्ट्रीय एवं साधनात्मक विषय जो सर्वसाधारण के लिए अत्यन्त उपयोगी हैं, अत्यन्त सरल शब्दों में वर्णित हैं। इन्हें बच्चे-बूढ़े, स्त्री-पुरुष, पढ़ – अपढ़ – सब समझ सकते हैं। अब इसके आगे हम मूल Kabir Saheb Bijak Ramaini की व्याख्या पर विचार करें।

” अन्तर ज्योति” इस Kabir Saheb Bijak Ramaini का महत्त्वपूर्ण शब्द है । अन्तर का अर्थ भीतर तथा ज्योति का अर्थ ज्ञान है। देहोपाधि में ही अन्तर या भीतर शब्द का प्रयोग हो सकता है। यह व्यक्ति के लिए ही कहा जा सकता है कि उसके भीतर ज्ञान- ज्योति है ।

सद्गुरु ने अगली Kabir Saheb Bijak Ramaini OR Kabir Bijak Ramaini में कहा है “जीव रूप एक अन्तर बासा। अन्तर ज्योति कीन्ह परकासा।” यहां भी अन्तर ज्योति व्यक्ति वाचक ही है। तात्पर्य है कि मनुष्य के भीतर ज्ञान – ज्योति है। यह ज्ञान – ज्योति जीव का गुण है।

वैसे सभी जीव ज्ञानस्वरूप हैं; परन्तु खानियों के अनुसार उनमें बाह्य ज्ञान का संकोच एवं विस्तार होता है। सभी खानियों में केवल मनुष्य एक ऐसी खानि है जहां शब्द – शक्ति तथा कल्पना शक्ति विकसित हैं।

” शब्द एक नारी” में शब्द और नारी- ये दोनों महत्त्वपूर्ण शब्द । शब्द अर्थात शब्द-शक्ति, वाक्- शक्ति और नारी अर्थात कल्पना-शक्ति। यहां नारी शब्द माया का प्रतीक है और माया मन की इच्छा एवं कल्पना ही है।

“इच्छा रूपि नारि अवतरी” अगली Kabir Saheb Bijak Ramaini में कहा गया है तथा 72वीं Kabir Saheb Bijak Ramaini में “नारी एक संसारहिं आई” कहकर यही भाव व्यक्त किया गया है।

इसके लिए साखी प्रकरण की 90, 94, 104 तथा 105वीं साखियां भी देखने योग्य हैं। कबीर साहेब के ख्याल से माया कोई स्वतन्त्र शक्ति नहीं है। वह केवल मन की कल्पना या मोह है।

59वें शब्द में भी “माया महा ठगिनी हम जानी” कहकर मन के मोह एवं कल्पना का ही संकेत है। मनुष्य को पशु से अलग करने वाली ये दो ही प्रमुख शक्तियां हैं— कल्पना- शक्ति तथा शब्द-शक्ति ।

सारे ज्ञान-विज्ञान का विकास, भूत-प्रेत, देवी-देवता, ईश्वर – ब्रह्म, लोक-परलोक, पुनर्जन्म-कर्मफलभोग, बंध-मोक्ष आदि की कल्पना मनुष्य ही करता है। पशु पक्षियों एवं कीड़ों में इन कल्पनाओं की कोई गुंजाइश नहीं है।

ज्ञान – शक्ति – सम्पन्न मानव जीव अपने मन की कल्पना तथा शब्द-योजना से नाना विचार प्रकट करता है। मानव की इसी कल्पना-शक्ति तथा शब्द-शक्ति द्वारा ब्रह्मा, विष्णु तथा महादेव की स्थापना हुई है।

‘बृहत्त्वात् ब्रह्म’ जो बढ़े या बड़ा हो वह ब्रह्म । प्राचीन आर्य लोग अग्नि को ब्रह्म मानकर पूजते थे । ब्रह्म

(अग्नि) के चारों ओर बैठकर जो उसकी उपासना करे वह ब्राह्मण कहलाता है । फिर यज्ञ के बड़े पुरोहित को ब्रह्मा कहा गया तथा उसके साथ अन्य तीन को होता, उद्गाता तथा अध्वर्यु कहा गया। इसके बहुत बाद ब्रह्मा नाम के एक देवता की कल्पना कर ली गयी और उसे सृष्टि का देवता माना गया।

वैदिक काल में सूर्य प्रधान देवता था । वही आगे विष्णु नाम ग्रहण कर व्यक्ति – देवता बन गया। पहले अनार्य जातियों में योनि तथा लिंग की पूजा व्याप्त थी। उसे आगे चलकर आर्यों के वैदिक रुद्र से मिलाकर महादेव एवं शिव के रूप में समर्थ देवता की कल्पना कर ली गयी। वैदिक रुद्र तूफान का देवता है । पीछे वह महादेव के रूप में प्रतिष्ठित होकर प्रलय का देवता बन गया। वह सिर पर अर्ध चंद्र एवं गंगा – लहर-धारी, पार्वती-पति तथा बैल पर सवारी करने वाला हो गया। यह सब मनुष्यों की मनः कल्पनाओं और शब्दों के विकास का फल है।

Kabir Saheb Bijak Ramaini-“ते तिरिये भग लिंग अनन्ता । तेउ न जानै आदिउ अन्ता ।” पुराणों में बताया गया है कि इन तीनों ने, अर्थात ब्रह्मा, विष्णु तथा महादेव ने बहुत-से नर-नारी पैदा किये, परन्तु वे स्वयं संसार का आदि – अन्त नहीं जान सके । ब्रह्मा, विष्णु तथा महादेव व्यक्ति रूप रहे हों या केवल कल्पना के जीव रहे हों, कोई फरक नहीं पड़ता। इतना सच है कि जगत का आदि और अन्त नहीं है । जगत अनादि तथा अनंत है।

Kabir Saheb Bijak Ramaini – “बाखर एक बिधाते कीन्हा चौदह ठहर पाट सो लीन्हा ।” सैकड़ों वर्षों के अंतराल में परपितामह, पितामह, पिता, पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, गुरु तथा शिष्यों द्वारा वेद-मंत्र बनते रहे और इन्हें लोग सुनाते-सुनते तथा कंठ करते रहे। इन सबका समय से संपादन हुआ। इस संपादन का श्रेय ब्रह्मा को दिया गया । इसलिए उनके चार मुख बना दिये गये, क्योंकि वे चारों वेदों के संपादक थे । ब्रह्मा ने वेद-मन्त्रों की बखारी बना दी। उन्होंने उन्हें चार वेदों के रूप में बड़ा संग्रह किया ।

फिर तो उस वाणी ने “चौदह ठहर पाट सो लीन्हा ।” अपना विस्तार चौदह विद्याओं में किया। वेदों के सहित चौदह विद्याओं का विस्तार इस प्रकार है- ‘पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, छह वेदांग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद तथा ज्योतिष) और चारों वेद ।’ 2 चौदह विद्याएं इस प्रकार भी गिनायी जाती हैं— ‘ब्रह्मज्ञान, रसायन, काव्य, वेद, ज्योतिष, व्याकरण, धनुर्विद्या, जलतरण, संगीत, वैद्यक, अश्वारोहण, कोकशास्त्र में प्रवीणता, नाटक चाटक तथा चातुरी।”¹

Kabir Saheb Bijak Ramaini -“हरिहर ब्रह्मा महन्तो नाऊँ । तिन्ह पुनि तीन बसावल गाऊँ ।” पुराणों में कहा गया कि ब्रह्मा, विष्णु तथा महादेव – ये महान नामधारी हुए । इन्होंने तीन गांव बसाये – ब्रह्मपुर, विष्णुपुर तथा शिवपुर । यह भी कहा जाता है कि इन्होंने स्वर्ग, पाताल तथा पृथ्वी को आबाद किया। इनके द्वारा धर्म के प्रसिद्ध तीन कांडों को चलाये जाने की भी बात कही गयी, जैसे ब्रह्मा ने कर्मकांड, विष्णु ने भक्तिकांड तथा महादेव ने ज्ञानकांड चलाया।

Kabir Saheb Bijak Ramaini – “तिन्ह पुनि रचल खण्ड ब्रह्मण्डा । छौ दर्शन छानबे पाखण्डा।” कहा जाता है कि उन त्रिदेवों ने ब्रह्मांड का खंड किया है। खंड तो समझ में आता है कि वह टुकड़ा है; परन्तु ब्रह्मांड क्या है, इसे समझना है। ब्रह्मांड पूरे विश्व को कहते हैं और पूरा विश्व कितना है, इसे कोई नहीं जानता। देश अनंत है, अतः विश्व भी अनंत है । ब्रह्मादि किसी व्यक्ति द्वारा उसके खंड, टुकड़ा तथा विभाग करने की बात एक घोर कल्पना है। हां, इस पृथ्वी को, या कहना चाहिए कि पृथ्वी के जितने हिस्से को वे जानते थे, उसे ब्रह्मांड मानकर उन्होंने उसका राज्यों में विभाजन किया होगा, यह कहा जाये तो ठीक है।

यहां ‘ब्रह्मांड’ का लाक्षणिक अर्थ वेद मानकर कहा जा सकता है कि ब्रह्मा ने वेद का विभाग किया और उसी को आधार मानकर पीछे छह दर्शन तथा छानबे पाखंडों का विस्तार हुआ । योगी, जंगम, सेवड़ा, संन्यासी, दरवेश तथा ब्राह्मण ² – ये छह दर्शन हैं। इनमें विभेद इस प्रकार है- दस संन्यासी, बारह योगी, चौदह दरवेश, अठारह ब्राह्मण, अठारह जंगम तथा चौबीस सेवड़ा (जैनी या बौद्ध) | ³

गिरि, पुरी, भारती, वन, पर्वत, आरण्य, सरस्वती, सागर, आश्रम तथा तीर्थ — ये दसनामी संन्यासी हैं। औघड़नाथ आदि भेद से बारह प्रकार के योगी है।

  1. ब्रह्मज्ञानरसायनं च कविता वेदस्तथा ज्योतिषम् ।व्याकरणंसधनुर्धरं जलतरं सङ्गीतकं वैद्यकम् ॥अश्वारोहणकोकशास्त्रनिपुणं नाट्यं तथा चातुरी।       विद्यानामचतुर्दश प्रतिदिनं शेषाः कलाः कीर्तितः ॥

2. योगी जंगम सेवड़ा, संन्यासी दरवेश ।छठवाँ कहिये ब्राह्मण, छौ घर छौ उपदेश ॥

3. दस संन्यासी बारह योगी, चौदह शेष बखान । ब्राह्मण अठारह अठारह जंगम, चौबीस सेवड़ा परमान ॥ (पंचग्रन्थी, मानुष विचार) जैनों में चौबीस तीर्थंकर तथा बौद्धों में चौबीस बुद्ध माने जाते हैं।

हैं। इसी प्रकार मुसलिम फकीरों में बारह भेद हैं। इसी प्रकार ब्राह्मणों, शैवों तथा सेवड़ों में अपने-अपने भेद-प्रभेद हैं। अब कर्मकाण्डों एवं पाखंडों का विस्तार केवल छानबे में नहीं रहा, किन्तु उनकी गणना करना कठिन होगा । संसार का कोई पंथ, संप्रदाय एवं समाज नहीं है जिसमें पाखंड नहीं घुस आये हैं। पाखंड का अर्थ है ढोंग, ढकोसला, छलावा आदि। सभी संप्रदायों का कर्तव्य है कि वे अपने-अपने मतों में घुस आये पाखंडों का त्याग करते रहें।

इस प्रकार इस प्रथम Kabir Saheb Bijak Ramaini की प्रथम पांच पंक्तियों में सद्गुरु ने हिन्दू परम्परा द्वारा मान्य त्रिदेवों, वेदों, विद्याओं एवं कर्मकांडों के विस्तार का संक्षिप्त समीक्षात्मक परिचय दिया। अब आगे वे मानव एकता के महासूत्र कह रहे हैं—

पेट न काहू वेद पढ़ाया।

सुन्नति कराय तुरुक नहिं आया ॥

नारी मोचित गर्भ प्रसूती ।

स्वांग धरे बहुतै करतूती ॥

तहिया हम तुम एकै लोहू ।

एकै प्राण बियापै मोहू ॥

एकै जनी जना संसारा ।

कौन ज्ञान से भयउ निनारा ॥

भौ बालक भगद्वारे आया।

भग भोगी के पुरुष कहाया ॥

महा मानवतावादी कबीर उक्त पांच पंक्तियों में निर्भीकतापूर्वक घोषणा करते हैं कि मानव मूलत: समान है। माता के पेट में से ही न तो कोई यज्ञोपवीत संस्कार कराकर, वेद पढ़कर तथा ब्रह्मज्ञानी एवं ब्राह्मण बनकर आता है और न कोई सुन्नत कराकर एवं मुसलमान बनकर आता है। पैदा होने के बाद जब संसार के भेद-भाव की हवा लग जाती है, तब मनुष्य कल्पित ऊंच-नीच एवं नाना वेषों के स्वांग तथा कर्मकांडों का पाखंड करता है ।

तथाकथित ब्राह्मण- शूद्र, हिन्दू-मुसलमान या अन्य लोगों की माताएं एक समान गर्भ धारण करती हैं, एक समान बच्चे पैदा करती हैं, एक समान सबके बच्चे मैले में लिपटे पैदा होते हैं, एक समान सबके बच्चे साफ किये जाते हैं, एक समान दूध पिलाये जाते हैं और एक समान पाले जाते हैं। कोई न तो मूड़ से पैदा होता है, न गोड़ से । सब एक ही द्वार से पैदा होते हैं। सभी वर्ग के लोग विषय-वासनाओं में डूबे देखे जाते हैं। सभी वर्गों में पवित्र विचार के नर और नारी भी होते हैं।

चतुर लोगों ने मानवता के साथ छल किया। उसके लिए एक विराट पुरुष (ईश्वर) की कल्पना की । छलावा का काम करने के लिए ईश्वर, धर्म आदि बड़े अच्छे हथकंडे बनते हैं। हर छल के लिए इन्हें आगे रखा जाता है। तो एक प्रभु बनाया गया। कहा गया उसके मुख, हाथ, जंघे तथा पैर से लोग पैदा हुए, जिनमें क्रमश: पहले वाले उच्चतम, पीछे वाले उत्तम एवं उससे पीछे वाले अधम हुए। प्रभु ने यह ऊंच-नीच का भेद स्वयं बनाया है, ऐसा धर्मशास्त्रों में लिख दिया गया । लिखने वालों को त्रिकालज्ञ एवं आप्त होने का फतवा दिया गया।

यह ऊंच-नीच की मानसिकता मनुष्य के मन में बहुत गहरे में बैठा दी गयी। वह निरंतर गहराती गयी। कुछ वर्ग के लोग आचरण – भ्रष्ट होने पर भी पूजे जाते रहे और कुछ वर्ग के लोग ज्ञान तथा सदाचार संपन्न होने पर भी नीच दृष्टि से देखे जाते रहे; और मानवता तथा सत्य के साथ अपराध करने वाले लोग तपःपूत ऋषि, त्रिकालज्ञ, संत शिरोमणि, आप्त एवं समाज के नायक कहलाते रहे।

जन्म से ही किसी वर्ग को नीच या ऊंच कहना सबसे बड़ा पाप है और यह पाप करने वाले सबसे बड़े पुण्यात्मा माने गये। स्वतंत्रचेता कबीर साहेब को यह अत्याचार सहन नहीं हुआ और वे उन्हीं लोगों के बीच में निर्भीकतापूर्वक जोर से बोल पड़े kabir Bijak Ramaini – “पेट न काहू वेद पढ़ाया। सुन्नति कराय तुरुक नहिं आया।” और ये तुरुक भी तो अपने को राहेखुदा तथा दूसरे को काफिर समझते हैं, क्योंकि इन्होंने सुन्नत करवा रखी है, इसलिए ये मुसलमान हो गये हैं। परन्तु यह भी प्राकृतिक नहीं है।

पेट में से सुन्नत कराकर नहीं आये हैं। ये सब बाहरी हैं। जनेऊ के समान सुन्नत भी बाहरी स्वांग है। इससे कोई बड़ा नहीं होता। पैदा होने में तो सभी मानव एक समान हैं। ज्ञान तथा आचरण के नाते ही मानव का अपना स्तर बनता है। जन्म से सबका स्तर समान है।

Kabir Saheb Bijak Ramaini :- “भौ बालक भगद्वारे आया। भग भोगी के पुरुष कहाया।”

सद्गुरु कबीर अखंड वैराग्यवान संत थे। अतः इस पंक्ति में उन्होंने बड़ी तीव्रता से अपना वैराग्यभाव व्यक्त किया है। वे कहते हैं कि मनुष्य जिससे पैदा होता है उसी का उपभोग करके पुरुष होने की डींग मारता है।

कबीर साहेब के वैरागी ख्याल से सच्चा पुरुष वह है जो नारी मात्र को माता मानकर जीवन पर्यंत विरक्त रहे । अविगति की गति काहु न जानी। एक जीव कित कहूँ बखानी ॥

Kabir Saheb Bijak Ramaini – जो मुख होय जीभ दस लाखा। तो कोइ आय महन्तो भाखा ॥ अज्ञात एवं लापता की बात कोई नहीं जानता। कोई ऐसा महान हो जिसके मुख में लाखों जीभ हों वही चाहे कुछ कह सके – यह एक व्यंग्य है। अज्ञात की बात तो लाखों जीभ वाला ही कहता है। आदमी पहले लाखों मुख एवं जीभ वाले की कल्पना करता है, फिर आकाश-पाताल की बातें उसी से कहलायी जाती हैं। तथाकथित धार्मिक संप्रदाय वाले पहले किसी अतिमानवीय शक्ति की कल्पना करते हैं।

उसके पश्चात उन्हें अपने कल्पित स्वार्थ की सिद्धि जिन बातों में दिखती है उन बातों को वे अपनी किताबों में लिख लेते हैं और कहते हैं कि यह विराट पुरुष, सुप्रीम पावर एवं जगन्नियंता प्रभु का कथन है । जगन्नियंता- प्रभु का नाम सुनते ही लोग गाय बनकर अपने सिर झुका देते हैं। क्योंकि उनकी आत्म-शक्ति कुचल दी गयी है। वे प्रश्न करें तो नास्तिक और काफिर कहे जायें। इसलिए धर्म के नाम पर सारी अतिशयोक्तियां, चमत्कार, अवैज्ञानिक प्रस्थापनाएं, भेदभावनाएं आदि चुपचाप स्वीकार ली जाती हैं। अन्य क्षेत्र में बात

समझ में न आये तो प्रश्न कर सकते हो, किन्तु धर्मक्षेत्र में प्रश्न नहीं कर सकते; क्योंकि धर्म की सारी बातों को हजार और लाख मुख वाले ने कहा है । उसमें प्रश्न करना ही बेजा है।परन्तु यह ठीक से समझ लेना चाहिए कि कोई हजार तथा लाख मुख वाला नहीं है जिसने मानव के ज्ञान तथा आचार के विषय में आज तक कुछ कहा हो।

ज्ञान करने वाला तथा मानव की आचार संहिता बनाने वाला केवल मानव है। Kabir Saheb Bijak Ramaini – “एक जीव कित कहूँ बखानी” कितना वर्णन करके कहूं, एक मानव-जीव ही ज्ञान-विज्ञान वेत्ता है । यही अतिमानवीय शक्ति का कल्पित परदा लगाकर लोगों को छलता है, यही छला जाता है। यही सुधर जाये तो सब सुधर जाये। यदि मानव विवेकशील हो जाये, वह एक दूसरे को न ठगे, स्वयं सत्पथ पर चले, तो उसका कल्याण है, समाज का कल्याण है, देश का तथा विश्व का कल्याण है। जिसका पता नहीं, उस ईश्वर से प्रेम करने का दिखावा और मनुष्य जो प्रत्यक्ष है, उसके साथ छलावा – यह पोंगापंथी धर्म मनुष्य का कल्याण नहीं कर सकता।

जो कल्पित आकाशीय स्वर्ग से दृष्टि घुमाकर पृथ्वी पर सत्कर्म के बल पर स्वर्ग बसाना चाहता है तथा अज्ञात ईश्वर के पीछे दौड़ना छोड़कर ज्ञात मानव एवं प्राणियों के साथ प्रेम तथा करुणा का व्यवहार करता है, वही सच्चा धार्मिक है। वही सत्य को समझता है।

“कहहिं कबीर पुकारि के, ई ले ऊ ब्यौहार।

राम नाम जानै बिना, भौ बूड़ि मुवा संसार ।”

कबीर साहेब पुकारकर कहते हैं कि मनुष्य ‘ई’ और ‘ऊ’ के व्यवहार में उलझा है। ‘ई’ से अभिप्राय सांसारिक विषयों से है तथा ‘ऊ’ से स्वर्ग और ईश्वर से है। विषयासक्ति, स्वर्ग की कल्पना तथा ईश्वर की कल्पना छोड़े बिना कोई सही रास्ता नहीं पा सकता। एक कवि ने कितना सुन्दर कहा है-

राह हक़ हरगिज़ न याबी, ता न गीरी चार तर्क ।

तर्क दुनिया तर्क उक़बा, तर्क मौला तर्क तर्क ॥ ‘

अर्थात- मनुष्य को सही रास्ता तब तक नहीं मिल सकता जब तक दुनियादारी, स्वर्ग की कामना और ईश्वर की कल्पना का त्याग तथा इन तीनों के त्याग के अहंकार का त्याग नहीं कर देता ।

संस्कृत में ‘इहामुत्र’ अर्थात ‘इह’ तथा ‘अमुत्र’ शब्द लोक और परलोक के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। कबीर साहेब अपना काव्य हिन्दी में कहते हैं, इसलिए उन्हें ‘ई’ तथा ‘ऊ’ कहते हैं। कबीर साहेब पुकार-पुकार कर कहते हैं कि संसार के लोग इस दुनिया के रागरंग में उलझे हैं या परलोक तथा परोक्ष कल्पित देवी-देवता एवं ईश्वरादि की कल्पना में उलझे हैं।कुल मिलाकर वे सत्य एवं सुख को अपने से बाहर ही खोजते हैं। यही जीवन का भटकाव है।

Kabir Saheb Bijak Ramaini – “राम नाम जानै बिना, भौ बूड़ि मुवा संसार ।” अर्थात राम ऐसा नाम किसका है, राम किसे कहते हैं, इस तत्त्व को समझे बिना लोग संसार – सागर में डूब रहे हैं।

कबीर साहेब के समय से सैंकड़ों वर्ष के पूर्व से ही राम शब्द का प्रचलन हो चला था जिसके अर्थ अयोध्याधीश दशरथ सुत राजाराम तथा परमतत्त्व एवं आत्म- अस्तित्व प्रचलित थे। राम शब्द को लेकर ये सारे भाव मिश्रित रूप से चलते थे और जनता में उलझन थी कि वस्तुतः राम शब्द से व्यक्त वह कौन- सातत्त्व है जो जीव का परम प्राप्तव्य है। लोग राम-राम तो कह रहे थे, परन्तु रामतत्त्व क्या है इसे जानने का प्रयत्न नहीं करते थे।

सद्गुरु कबीर ने Kabir Saheb Bijak Ramaini 36वीं की साखी में कहा है

“राम नाम निजु जानि के, छाड़ि देहु बस्तु खोटि ।”

अर्थात राम ऐसा नाम अपना ही समझकर खोटी वस्तु छोड़ दो। निज चेतन स्वरूप से जो कुछ पृथक है, सब खोटी वस्तु है। यदि व्यक्ति की अपनी आत्मा से अलग राम है तो वह राम नहीं है, किन्तु राम के नाम पर केवल कल्पना है। हम राम, ब्रह्म, परमात्मा, अल्लाह, गॉड या इसी ढंग के अन्य अनेक शब्द गढ़ लें, परन्तु अपनी चेतन आत्मा से अलग कुछ नहीं हो सकता जो हमारा परम विश्राम का निधान हो। हमारी चिरस्थिति हमारे अपने चेतन स्वरूप में ही होगी, अतएव निज चेतन स्वरूप ही राम है।

उक्त भावों को लेकर ही श्रुतियों में अहं ब्रह्मास्मि’, तत्त्वमसि’, अयमात्मा ब्रह्म’ तथा प्रज्ञानं ब्रह्म’ कहे गये हैं, जिनके सरल अर्थ “मैं ब्रह्म हूं, तू वही है, यह आत्मा ब्रह्म है तथा ज्ञान ही ब्रह्म है” होते हैं। गीता में भी महाराज श्री कृष्ण से कहलाया गया है- “इस देह में निवास करने वाला प्रकृति से परे जो चेतन पुरुष है वही द्रष्टा, अनुमंता (प्रेरक), भर्ता, भोक्ता, महान ईश्वर तथा परमात्मा है।

भगवत गीता में आत्मा और परमात्मा के बारे में बहुत ही सुंदर वर्णन किया गया है जो कि निम्नलिखित है-

उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥ 

राम है, फिर किसलिए बाहर खोजा जाता है। यह तो लज्जाजनक कुमति है। तुलसीदास साहेब जी अपनी तुलसी सतसई में कहते हैं एक अन्य उदाहरण-

कहत सकल घट राममय, तो खोजत केहि काज ।

तुलसी कह यह कुमति सुनि, उर आवत अति लाज ॥ (तुलसी सतसई)

वे और कहते हैं- “मैं वही हूं यह अखंडवृत्ति ही विज्ञान दीप की परम प्रचंड शिखा है।

दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा ॥

 बाबा रघुनाथ दास जी भी कहते हैं- “जीव और ईश्वर में कितना अन्तर है ? उत्तर है, मात्र इतना ही अन्तर है कि बंधनों की दशा में उसी को जीव कहा जाता है और जब उसके बंधन कट गये, तब वही शिव हो गया।”

जनाब मीर साहेब भी कहते हैं— “सिर पैर तक इच्छाओं में लिपटे हुए होने से हम गुलाम हैं, अन्यथा यदि हम हृदय से इच्छारहित होते तो स्वयं ईश्वर थे।”” “जो यह कहता है कि जीव से ईश्वर अलग है वह अधकचरा ज्ञान वाला है। जो आत्मा में परमात्मा का बोध करा दे वही गुरु है। श्रुति कहती है- “वह तो शरीर के भीतर अपना आत्म स्वरूप है। उसे वह समझता है जो दोषों से मुक्त हो गया है।”

सार यह है कि मनुष्य की आत्मा के अलावा राम कुछ नहीं है। निज आत्मस्वरूप ही राम है। हमारा चिर विश्राम-स्थल निज चेतन स्वरूप ही राम है, खुदा है, ईश्वर है, ब्रह्म है। इसके अलावा खोजना भ्रम है।

कहता है खुदा खुद से जुदा जानो अधूरा है।

दिखला दे खुद ही में खुदा, पीर उसे कहते हैं।

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इस प्रकार यह प्रथम kabir saheb bijak ramaini जो इस ग्रन्थ का पहला छंद है, इस ग्रन्थ की प्रस्तावना एवं भूमिका रूप है। पूरे ग्रन्थ में जो कुछ कहा गया है, उसे सार रूप में इस kabir saheb bijak ramaini में बता दिया गया है और इसके बाद मानो पूरा Satguru Kabir Bijak Granth इस एक bijak of guru kabir ramaini की व्याख्या है।

sadguru kabeer saheb ने ‘अन्तर ज्योति’ कहकर मनुष्य की अन्तश्चेतना को प्रथम एवं मुख्य स्थान दिया है। फिर पांच पंक्तियों में भारतीय ढंग से ब्रह्मादि त्रिदेवों, सृष्टि की अनंतता, वेद, चौदह विद्याएं, तीन लोक, तीन कांड, छह दर्शन, छानबे पाखंड आदि को इंगित किया है।

इसके बाद छठीं से नवीं चौपाई तक मानवीय एकता पर प्रकाश डाला है। जो उनके मुख्य विषयों में से एक है। आगे दसवीं चौपाई में वैराग्य की तीव्रता का वर्णन है। फिर अगली दो चौपाइयों में मानव जीव की विशेषता तथा इससे पृथक अज्ञात बातों की उलझी हुई दशा का दिग्दर्शन कराया है। अंत में साहेब ने इस रमैनी की साखी में इस बात पर जोर दिया है कि लोग राम-राम तो कहते हैं, परन्तु उसको तत्त्वतः नहीं समझते और लोक-परलोक के मायाजाल में उलझे रहते हैं। वस्तुतः निज स्वरूप ही राम है। इस तरह यह प्रथम रमैनी इस ग्रन्थ का सार एवं प्रस्तावना स्वरूप है।

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